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Showing posts from October, 2020

सीबीआई की भूमिका तथा आगे की राह

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संजय धाकड़ (लेखक) Current Content  >> केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की भूमिका केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की भूमिका WhatsApp Facebook Twitter Pinterest Email Share केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की भूमिका Date: 20-12-16 To Download Click   Here केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो हमारे देश की एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था है। जाहिर है कि इसके प्रमुख की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सी.बी.आई. के प्रमुख को प्रधानमंत्री से लगातार संपर्क में रहना पड़ता है। संस्था की गतिविधियों और कार्यों से प्रधानमंत्री को निरंतर अवगत कराना पड़ता है। साथ ही जांच-पड़ताल के कामों में अपनी स्वतंत्रता को भी कायम रखना पड़ता है। इस प्रकार सी.बी.आई. और इसके प्रमुख का काम अत्यंत उत्तरदायित्व का है। यह संस्था ऐसी संवेदनशील स्थिति में काम कर रही होती है, जहाँ इसे सरकारी पक्ष और निजी पक्ष के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता है वर्तमान में और पहले भी बहुत से प्रकरणों में ब्यूरो की भूमिका पर ऊंगली उठायी गई है। इसका कारण यही है कि इसके अधिकारियों के पास अपार शक्ति होती है। ये अधिकारी कई बार तो मामले की तह तक जाने के लिए और कई बार अपनी शक...

न्यायिक सक्रियता

संजय धाकड़ न्यायिक सक्रियता   दिसंबर२०२७ संपादकीय  मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुदीप रंजन सेन ने निवास प्रमाण पत्र से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए सबको विस्मित करने वाली टिप्पणी करते हुए कहा है कि आजादी के समय जब देश का विभाजन हुआ, तब पाकिस्तान ने अपने को इस्लामिक राज्य घोषित किया था। भारत को भी उसी समय हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था। न्यायाधीश सेन को कानून और संविधान की सीमाओं में रहकर उस व्यक्ति के निवास प्रमाण पत्र से संबंधित मामले में अपना फैसला देना था, जिसे राज्य सरकार ने खारिज कर दिया था। लेकिन न्यायाधीश महोदय ने ऐसी टिप्पणी की, जिसका इस मामले से कोई लेनादेना नहीं था। न्यायाधीशों को ऐसे फैसले और टिप्पणियों से बचना चाहिए जिनकी प्रासंगिकता और न्यायिक सीमा संदिग्ध हो। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करता है, और यह संविधान की आत्मा या मूल ढांचा है। मूल ढांचे में बदलाव या संशोधन करने के मामले में 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया था, जो आज भी तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद कायम है। यह निर्णय केशवानंद बनाम...

हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ

संजय हिंदी भाषा में सविधान का प्राधिकृत पाठ Que 1 :- असंगत कथन है 1- मूल संविधान में हिंदी भाषा मे प्राधिकृत पाठ के सम्बंध में कोई प्रावधान नही है 2- 58 वें संविधान संसोधन अधिनियम में इस सम्बंध में प्रावधान किया गया था अ) कथन 1 और 2 असंगत है ब) केवल कथन 1 असंगत है स) केवल कथन 2 असंगत है द) कथन 1 और 2 दोनों संगत✔ व्याख्या:-  मूल संविधान में हिंदी भाषा मे प्राधिकृत पाठ के सम्बंध में कोई प्रावधान नही है, बाद में 58 वें संविधान संसोधन (Constitutional amendment) अधिनियम में इस सम्बंध में प्रावधान किया गया था।   Que 2 :- 58 वा संविधान संसोधन अधिनियम 1987 के द्वारा संविधान के भाग XXII के अनुच्छेद 394-क जोड़ा गया। मूलतः इस भाग ने तीन अनुच्छेद 393 , 394 और 395 हैं , इनमे कौनसा सम्बन्धित नही है अ) संक्षिप्त नाम ब) प्रारम्भ स) निरसन द) इतिहास✔ व्याख्या:-  मूलतः इस भाग ने तीन अनुच्छेद 393( संक्षिप्त नाम) , 394 ( प्रारम्भ) और 395 (निरसन) हैं   Que 3 :- अनुच्छेद 394-के सन्दर्भ में कौन संविधान के अनुवादित हिंदी पाठ को प्राधिकृत पाठ के रूप में राजपत्र में प्रकाशित करने का व्यवस्था कर...

सुभाष काश्यप के न्यापालय के बारे में विचार

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विधायिका एवं न्यायपालिका के टकराव पर लोकसभा के पूर्व महासचिव श्री सुभाष कश्यप के विचार WhatsApp Facebook Twitter Pinterest Email Share Date: 24-06-16 To Download Click  Here . यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी मामले पर सुनवाई करने का विशेष अधिकार है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे विधि-निर्माण का भी अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में भी कुछ गलतियाँ हो सकती हैं, जिनमें सुधार भी संभव है। दुर्भाग्य से आज सरकार के तीनों महत्वपूर्ण अंग अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन करने की अपेक्षा उनका ध्यान दूसरों के मामलों में अधिक है। विधायिका, कार्यपालिका के कामों में अधिक रुचि ले रही है, न कि नीतियों के निर्माण में। वह कार्यपालिका की अधिक से अधिक शक्तियों को हासिल कर रही है। सन् 1970 के बाद से आज तक संसद में एक भी निजी सदस्य के तौर पर प्रस्तुत विधेयक पारित नहीं हो सका है। ऐसा क्यों? संसद में जितने भी विधेयक पारित होते हैं, उनमें 99 प्रतिशत ज्यों के त्यों पारित कर दिए जाते हैं। पता नहीं क्यों, विधेयकों पर बहस करना आवश्यक नहीं समझा जाता। कुछ वर्षों से सांसदों द्वारा सदन में किए जा रह...

UPSC के हर प्रश्न का जवाब

संजय धाकड़ (लेखक) प्रश्न: सिविल सेवा परीक्षा में आवेदन करने के लिए न्यूनतम योग्यता क्या होनी चाहिए? उत्तर: सिविल सेवा परीक्षा में ऐसी सभी उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं जिन्होंने स्नातक स्तर या इसके समकक्ष कोई डिग्री प्राप्त की हो। जिन उम्मीदवारों के पास ऐसी व्यवसायिक और तकनीकी योग्यताएं हो, जो सरकार द्वारा व्यवसायिक व तकनीकी डिग्रियों के समकक्ष मान्यता रखते हैं, वे भी इस परीक्षा में बैठ सकते हैं। प्रश्न: यदि किसी ने एमबीबीएस अथवा कोई अन्य चिकित्सा परीक्षा पास की हो, लेकिन अपना इंटर्नशिप पूरा नही किया हो, तो क्या वह इस परीक्षा को देने के लिए योग्य होगा? उत्तर:  ऐसे उम्मीदवार को भी परीक्षा के लिए आवेदन करने के प्रपत्र के साथ संबंधित विश्वविद्यालय था संस्था के संबंधित सक्षम प्राधिकारी से अनुप्रमाणित (।जजमेजमक) कराकर अपनी मूल डिग्री अथवा प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने होंगे कि उन्होंने डिग्री प्रदान करने हेतु सभी अपेक्षाएँ (जिसमें इण्टर्नशिप पूरा करना की शामिल है) पूरी कर ली है। प्रश्न: मैनें स्नातक के अंतिम वर्ष की परीक्षा दी है, लेकिन अभी अंतिम परिणाम घोषित नहीं हुये है। क्या मैं उस वर्ष सि...
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चीन : पहले कर्ज दो, फिर कब्जा करो खुले हाथों कर्ज बांटने की चीन की इस नीति को ‘चेक डिप्लोमैसी’ नाम दिया गया है। रहीस सिंह , (विदेश मामलों के विशेषज्ञ) चीन इस समय उस साहूकार की तरह बर्ताव कर रहा है, जो पहले तो गरीब किसानों को कर्ज देता है और फिर कर्ज नहीं चुकाने पर उनकी जमीन पर कब्जा कर लेता है। चीन अपनी यह साहूकारी हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत और अटलांटिक तक के उन छोटे व गरीब देशों पर आजमा रहा है जो उसके लिए स्ट्रैटेजिक डेस्टिनेशन्स हैं और जिनके जरिए वह अपनी आर्थिक व साम्राज्यिक महत्वाकांक्षाएं पूरी कर सकता है। घातक है चीन की चेक डिप्लोमैसी खुले हाथों कर्ज बांटने की चीन की इस नीति को ‘चेक डिप्लोमैसी’ (Cheque Diplomacy) नाम दिया जा रहा है। इसके जरिए वह दक्षिण एशियाई देशों में ही नहीं, पूर्वी एशिया से लेकर अफ्रीकी देशों तक में अपनी घुसपैठ बना रहा है। इसके तहत पहले तो चीन खूब कर्ज देता है और जब चीन द्वारा दिए गए कर्ज को कोई देश चुकता नहीं कर पाता तो उन प्रोजेक्ट्स में इक्विटी खरीद लेता है, जिनके लिए उसने कर्ज दिया था। बाद में चीन इन प्रोजेक्ट्स को अपनी कंपनियों के सुपुर्द कर देता है। ये ...

मानव विकास सूचकांक 2020

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  मानव विकास सूचकांक २०२० हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme) द्वारा मानव विकास सूचकांक (Human development Index- HDI) 2019 जारी किया गया। प्रमुख बिंदु: सूचकांक के अनुसार, 189 देशों की सूची में भारत 129वें स्थान पर है। भारत की स्थिति में एक स्थान का सुधार हुआ है, ग़ौरतलब है कि वर्ष 2018 में भारत 130वें स्थान पर था। इस सूचकांक की वरीयता सूची में नार्वे, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड और जर्मनी शीर्ष स्थानों पर हैं। सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर क्रमशः नाइजर, दक्षिण अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण सूडान, चाड और बुरुंडी हैं। भारत के पड़ोसी देशों में श्रीलंका 71वें स्थान पर और चीन 85वें स्थान पर हैं। वहीं भूटान 134वें, बांग्लादेश 135वें, म्याँमार 145वें, नेपाल 147वें, पाकिस्तान 152वें और अफगानिस्तान 170वें स्थान पर हैं। दक्षिण एशिया वर्ष 1990 से 2018 के बीच विश्व में सबसे तेज़ गति से विकास करने वाला क्षेत्र है। इस अवधि में मानव विकास सूचकांक के संदर्भ में दक्षिण एशिया में 46% की वृद्धि दर्ज की गई। वहीँ पूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 43% की...