डिजिटल मीडिया का नियमन
संजय धाकड़ डिजिटल मीडिया को नियमों से बांधने में भ्रमित सरकार विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील सन 1991 में भारत में उदारीकरण के साथ विश्व में वेबसाइट के चलन की शुरुआत हुई। उसके 30 साल बाद अब भारत समेत पूरा संसार लगभग 1.8 अरब वेबसाइट्स और 45 लाख एप्स के नागपाश में बंध-सा गया है। सबसे बड़ा बाज़ार होने के बावजूद भारत में सरकार, संसद व सुप्रीम कोर्ट, इंटरनेट की प्रचंडता को समझने में विफल रहे हैं। इसकी एक मिसाल केंद्र सरकार की नई अधिसूचना है, जिससे ऑनलाइन समाचार और ओटीटी सामग्री को अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन कर दिया गया है। इंटरनेट की दुनिया में भारत के आईटी इंजीनियर विश्व का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन इस सरकारी अधिसूचना से ऐसा लग रहा है कि नौकरशाही ने इंटरनेट नियमन के प्ले ग्रुप में पहला कदम ही रखा है। अभिव्यक्ति की आज़ादी को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर सकने वाले इस बड़े कदम से सरकार की मंशा के साथ तीन बड़े संवैधानिक सवाल खड़े होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 77 के तहत जारी इस अधिसूचना से यह स्पष्ट नहीं है कि 9 नवंबर के पहले सरकार का कौन-सा मंत्रालय ऑनलाइन न्यूज़ और ओटीटी कंटेंट का नियमन ...