लोकतंत्र की राह कहां जा रही है
लोकतंत्र के मंदिरों को दागियों से बचाएं
यशपाल सिंह , ( लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी हैं )
इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में राजनीति में बढ़ रहे अपराधीकरण पर रोक लगाने संबंधी दायर एक जनहित याचिका पर बहस चल रही है। इस याचिका के समर्थन में बहस करते हुए कहा गया कि किसी सरकारी नौकरी के लिए सरकार पुलिस से संबंधित व्यक्ति की आपराधिक गतिविधियों, चाल-चलन और सामान्य छवि आदि की जांच कराती है। अगर प्रतिकूल रिपोर्ट प्राप्त हुई तो उसकी भर्ती असंभव-सी हो जाती है, परंतु सांसद और विधायक कोई अपराधी भी हो सकता है। चाहे अपराध ही उसका कारोबार क्यों न हो। कुछ का केस तो जमानत के योग्य ही नहीं होता, फिर भी वह जेल से चुनाव लड़कर जन प्रतिनिधि बन जाता है। उसे वेतन, भत्ता और वार्षिक सांसद/विधायक निधि मिलने लगती है। ऐसे में गुणात्मक सुधार के लिए अपराधियों के चुनाव लड़ने पर कुछ प्रतिबंध क्यों नहीं लगाए जा सकते? सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के हिसाब से वर्तमान एवं पूर्व सांसदों और विधायकों पर कुल 4442 केस लंबित हैं। इसमें करीब 413 मुकदमें ऐसे हैं, जिनमें उम्र कैद की सजा है। इन 413 में भी 172 केस वर्तमान सांसदों और विधायकों के खिलाफ हैं। इसी प्रकार वर्तमान और पूर्व सांसदों/विधायकों के खिलाफ देशभर की अदालतों में भ्रष्टाचार के 175 और काला धन रखने के कुल 14 मामले लंबित हैं। सवाल है कि आखिर अपराधी जनप्रतिनिधि क्यों बनना चाहते हैं? दरअसल वे सत्ता और शासन के करीब आकर अपने आपराधिक मामलों को रफा-दफा करना चाहते हैं। वे स्थानीय पुलिस और अपने विरोधियों को धौंस में लेकर वर्चस्व कायम कर लेते हैं। फिर वे अपराध छोड़कर माफिया बन जाते हैं। सफेदपोश बनकर हर प्रकार का अवैध धंधा कर अकूत संपत्ति के मालिक बन जाते हैं और अपने चुनावी क्षेत्र में अजेय हो जाते हैं।
जब मैं पुलिस महानिदेशक था तब अपराधी किस्म के जनप्रतिनिधियों ने दो विधायकों की हत्या कराई थी। मामलों की जांच सीबीआइ तक ने की, लेकिन हुआ कुछ नहीं। कानूनी न्याय को साक्ष्य चाहिए, जिसे अपराधी तत्व कोर्ट के समक्ष जाने ही नहीं देते। कानून के हाथ लंबे जरूर हैं, परंतु अब वे बूढ़े और जर्जर हो गए हैं। उसकी मांसपेशिया बहुत कमजोर हो गई हैं। आज जमाना बहुत बदल गया है। समाज में नैतिकता दुर्लभ होती जा रही है। हत्यारे गवाहों की ही हत्या करने लगे हैं। ऐसे में आंख बंदकर न्याय की देवी कहां तक न्याय दे सकेगी? इस गंभीर प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट को अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए आदेश पारित करने पर विचार करना पड़ेगा, क्योंकि सिर्फ न्यायालयों में पड़े लंबित मुकदमों के शीघ्र निस्तारण पर जोर देने से ही इस गंभीर समस्या का हल संभव नहीं दिखता।
सदियों पुराना एक सिद्धांत है, जो यह कहता है कि जब तक अदालत किसी को दोषी न करार दे, तब तक वह निर्दोष है। आज भी अगर हम शातिर अपराधियों के संबंध में यही मानकर चलते रहेंगे तो राजनीति के अपराधीकरण को कोई रोक नहीं पाएगा। हमारे सांसदों/विधायकों के क्षेत्र काफी व्यापक होते हैं। वोटरों की संख्या भी बहुत अधिक होती है, जिनमें तमाम गरीब और अनपढ़ होते हैं। ऐसी स्थिति में कोई बाहुबली और धनपशु ही चुनाव मैनेज कर सकता है। अगर यही क्रम चलता रहा तो विधायी सदनों में एक दिन उनका बहुमत होगा और वे संवैधानिक पदों पर भी आसीन हो जाएंगे। फूलन देवी ने फरवरी, 1981 को दो बजे दिन में अन्य डकैतों के साथ बेहमई गांव में 26 लोगों को गोलियों से भून दिया था, जिसमें से 20 मौके पर ही मर गए थे। वे सभी आज भी निर्दोष हैं, क्योंकि कोर्ट का फैसला 40 साल बाद भी नहीं आ सका है। फूलन देवी भी मरने से पहले दो बार सांसद रह चुकी थीं। इधर उत्तर प्रदेश सरकार हर जनपद के शीर्ष दस अपराधियों की सूची बनाकर उनकी अवैध संपत्तियों को खोजने, उन्हेंं गिराने और सरकारी कब्जे में लेने का काम कर रही है। प्रयागराज और गाजीपुर के दो बाहुबली नेताओं की करोड़ों की संपत्तियां गिराई गई हैं और कब्जे में ली गई हैं। ऐसे आपराधी किस्म के लोग छोटे कर्मचारियों को पैसे देकर फर्जी कागजात बनवा लेते हैं और ऊपर के अधिकारियों को अपने राजनीतिक रसूख से निष्क्रिय कर देते हैं। चिंता की बात है कि आज हर कार्य में माफिया घुस चुके हैं।
नेता, अपराधी और पुलिस गठजोड़ पर एनएन वोहरा समिति ने बहुत पहले अपनी रिपोर्ट दी थी, लेकिन उसकी सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। राजनीतिक दलों द्वारा अपने निहित स्वार्थ के कारण अपराधी तत्वों को खुद से दूर रखने की कोई संभावना नहीं दिखाई दे रही है। ऐसे में अब न्यायपालिका पर ही आस टिकी है। देश और समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना चाहिए और अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए दागी लोगों के चुनाव लड़ने पर कुछ सुविचारित प्रतिबंध लगाना चाहिए। सबसे न्यायोचित प्रतिबंध यही हो सकता है कि आइपीसी की कुछ जघन्य धाराएं निर्धारित कर दी जाएं। अगर उनके तहत किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है और आरोप पत्र का कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है तो ऐसे मामलों में प्रदेश के उच्च न्यायालय से चुनाव लड़ने के लिए एनओसी लेना आवश्यक हो। उच्च न्यायालय अपराध की गंभीरता, साक्ष्य और उस व्यक्ति के आपराधिक इतिहास देखने के बाद उचित निर्देश दे। इस एक कदम से समाज की नैतिकता और सोच पर व्यापक असर पड़ेगा। प्रजातंत्र का आधार ही निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव है। इससे ही उसकी मर्यादा स्थापित होगी और देश कानून के राज्य की स्थापना की ओर सही अर्थों में अग्रसर होगा।
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