न्यायिक सक्रियता

संजय धाकड़

न्यायिक सक्रियता   दिसंबर२०२७

संपादकीय 

मेघालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुदीप रंजन सेन ने निवास प्रमाण पत्र से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए सबको विस्मित करने वाली टिप्पणी करते हुए कहा है कि आजादी के समय जब देश का विभाजन हुआ, तब पाकिस्तान ने अपने को इस्लामिक राज्य घोषित किया था। भारत को भी उसी समय हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए था। न्यायाधीश सेन को कानून और संविधान की सीमाओं में रहकर उस व्यक्ति के निवास प्रमाण पत्र से संबंधित मामले में अपना फैसला देना था, जिसे राज्य सरकार ने खारिज कर दिया था। लेकिन न्यायाधीश महोदय ने ऐसी टिप्पणी की, जिसका इस मामले से कोई लेनादेना नहीं था। न्यायाधीशों को ऐसे फैसले और टिप्पणियों से बचना चाहिए जिनकी प्रासंगिकता और न्यायिक सीमा संदिग्ध हो। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करता है, और यह संविधान की आत्मा या मूल ढांचा है। मूल ढांचे में बदलाव या संशोधन करने के मामले में 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया था, जो आज भी तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद कायम है। यह निर्णय केशवानंद बनाम केरल राज्य के नाम से जाना जाता है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के 13 न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा था कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके जरिए संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। जाहिर है कि देश के कानून के दायरे में रहकर ही न्यायाधीशों को अपना फैसला देना चाहिए। लेकिन विडंबना है कि कई बार अदालतें अपनी सीमाओं और शक्तियों का विस्तार करते हुए फैसला देती हैं, जिसे ‘‘शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत’ का उल्लंघन माना जाता है। पश्चिमी विचारक मांटेस्कयू इस सिद्धांत के प्रवर्तक रहे हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की सफलता के लिए इसके तीनों अंगों-न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच पूरी तरह शक्तियों का बंटवारा करने का विचार प्रस्तुत किया था। हालांकि नागरिकों को यह बहस करने का संवैधानिक अधिकार है कि भारत को किस तरह की शासन पण्राली चाहिए। वसंत साठे ने संसदीय पण्राली बनाम अध्यक्षात्मक पण्राली पर बहस की शुरुआत की थी। इसी तरह भारत के लिए हिन्दू राष्ट्र, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य, सर्वहारा का अधिनायकत्व या मार्क्‍सवादी राज्य में से कौन-सी शासन पण्राली बेहतर होगी, इस पर नागरिकों को विचार-विमर्श करने की आजादी है, लेकिन न्यायाधीशों को चाहिए कि वे न्याय के ढांचे के तहत ही फैसला दें।



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