चीन : पहले कर्ज दो, फिर कब्जा करो

खुले हाथों कर्ज बांटने की चीन की इस नीति को ‘चेक डिप्लोमैसी’ नाम दिया गया है।

रहीस सिंह , (विदेश मामलों के विशेषज्ञ)

चीन इस समय उस साहूकार की तरह बर्ताव कर रहा है, जो पहले तो गरीब किसानों को कर्ज देता है और फिर कर्ज नहीं चुकाने पर उनकी जमीन पर कब्जा कर लेता है। चीन अपनी यह साहूकारी हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत और अटलांटिक तक के उन छोटे व गरीब देशों पर आजमा रहा है जो उसके लिए स्ट्रैटेजिक डेस्टिनेशन्स हैं और जिनके जरिए वह अपनी आर्थिक व साम्राज्यिक महत्वाकांक्षाएं पूरी कर सकता है।

घातक है चीन की चेक डिप्लोमैसी

खुले हाथों कर्ज बांटने की चीन की इस नीति को ‘चेक डिप्लोमैसी’ (Cheque Diplomacy) नाम दिया जा रहा है। इसके जरिए वह दक्षिण एशियाई देशों में ही नहीं, पूर्वी एशिया से लेकर अफ्रीकी देशों तक में अपनी घुसपैठ बना रहा है। इसके तहत पहले तो चीन खूब कर्ज देता है और जब चीन द्वारा दिए गए कर्ज को कोई देश चुकता नहीं कर पाता तो उन प्रोजेक्ट्स में इक्विटी खरीद लेता है, जिनके लिए उसने कर्ज दिया था। बाद में चीन इन प्रोजेक्ट्स को अपनी कंपनियों के सुपुर्द कर देता है। ये कंपनियां अनेक कर्मचारियों को लेकर उन देशों में पहुंच जाती हैं। फिर वहां एक चीनी बस्ती का निर्माण होने लगता है। इसके बाद पूंजी, कंपनी और लोगों की सुरक्षा के नाम पर चीनी सैन्य टुकड़ी पहुंच जाती है। इस तरह चीन जगह-जगह नवउपनिवेशवादी व्यवस्था बना रहा है।

इस तरह आजमाता है गलत हथकंडे

चीन कर्ज देते समय कई तरह के गलत हथकंडे भी आजमाता है। उदाहरणार्थ वर्ष 2016 में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बांग्लादेश की यात्रा पर गए थे तो उन्होंने बांग्लादेश को 24.45 बिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट के लिए ऋण देने पर सहमति दी थी। यह ऋण राशि बांग्लादेश के सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 20 प्रतिशत के बराबर थी। चीन द्वारा दिया गया कर्ज ‘गवर्नमेंट टू गवर्नमेंट’ (जी टू जी) था। जी टू जी एक तरह का सॉफ्ट ऋण होता है जो बहुत ही कम ब्याज पर (0.5 फीसदी तक) दिया जाता है। लेकिन बाद में चीनी अधिकारियों ने इस सॉफ्ट ऋण को कॉमर्शियल ऋण में बदलने का फैसला सुना दिया, जिस पर भारी ब्याज चुकाना होगा। परिणाम यह हुआ कि बांग्लादेश चीनी कुचक्र में फंस गया। इसी तरह चीन ने मालदीव की इब्राहीम सालिह की सरकार को 3.2 अरब डॉलर का इनवॉइस थमाया है।

श्रीलंका, नेपाल, पाक भी चपेट में

बांग्लादेश और मालदीव ही नहीं, श्रीलंका, पाकिस्तान व नेपाल सहित पूर्वी एशिया के कई देश चीन की इस कर्ज डिप्लोमेसी की चपेट में हैं। श्रीलंका ने हम्बनटोटा सहित कई परियोजनाओं के लिए चीन से कर्ज लिया था, लेकिन अपनी न्यूनतम आर्थिक विकास दर के कारण वह इस कर्ज को चुका पाने में असमर्थ है। इस कारण चीनी ब्याज अब इक्विटी में बदल रहा है और श्रीलंका के घरेलू प्रोजेक्ट्स में चीन की हिस्सेदारी बढ़ रही है। इससे चीन को श्रीलंकाई आर्थिक संसाधनों से जुड़ने के साथ-साथ हिन्द महासागर में अपनी सामरिक ताकत को बढ़ाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। यही स्थिति नेपाल और पाकिस्तान के साथ भी है।

विश्व व्यवस्था बदलने की कोशिश

चीन, कंबोडिया, म्यांमार, लाओस से लेकर अफ्रीकी देशों को भी शिकार बना रहा है। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को ऋण जाल में फंसाकर वह दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। अफ्रीकी देशों में पहुंचकर वह अमेरिकी ताकत को काउंटर करना चाहता है। म्यांमार लगभग 16 बिलियन डॉलर के चीनी ऋण के नीचे दबा हुआ है। कम्बोडिया पर कुल अंतरराष्ट्रीय ऋण का लगभग 70 प्रतिशत ऋण चीन का है। चीन अफ्रीकी देश जिबूती में भी सैन्य बेस तथा आधारभूत सुविधाओं का विकास कर रहा है और इसके लिए उसने जिबूती को 14 बिलियन डॉलर का कर्ज दिया है। चीन जिबूती का उपयोग हिन्द महासागर में वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए करना चाहता है।



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