भारतीय न्याय व्यवस्था की समस्याएं

संजय धाकड़

भारतीय न्यायपालिका और हैबियस पोर्कस कानून

शेखर गुप्ता

शीर्षक पढ़कर यह मत सोचिए कि टाइपिंग की कोई त्रुटि है। यहां ऐसे निरामिष भोजन का जिक्र भी नहीं है जो किसी को पसंद तो किसी को नापसंद आता हो। यह बुरा लगने वाला शीर्षक इरादतन दिया गया है। यह ऐसे समय में एक अहम बात सामने लाने के लिए किया गया है। वह यह कि हमारी न्याय व्यवस्था का मूल ध्येय वाक्य-जमानत नियम है, जेल अपवाद-अब उलट चुका है।

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जानकारी रखने वाले किसी भी अपराध संवाददाता से पूछिए कि पुलिस अधिकारी निजी बातचीत में अपने राज्यों या जिलों में अपराध नियंत्रण के लिए कौन से तरीकों को अपनाते हैं या प्राथमिकता देते हैं। इसे कहते हैं अपराध को ‘चुपचाप छिपाना।’ ऐसा इसलिए कि पुराने तरीके की पुलिसिंग, जांच और अभियोजन आदि की प्रक्रिया कष्टसाध्य है और इसके नतीजे काफी अनिश्चितता भरे होते हैं। ऐसे में समझदारी यही है कि कम से कम मामले दर्ज किए जाएं। यह अपराध नियंत्रण का सबसे सुरक्षित और सुनिश्चित तरीका है। ऐसे में आपका प्रदर्शन बहुत अच्छा नजर आता है और वार्षिक गोपनीयता रिपोर्ट में भी उसे बेहतरीन करार दिया जाता है।

इसी प्रकार यदि हमारी न्यायपालिका की प्राथमिक जवाबदेही है हमारी आजादी सुनिश्चित करना। यदि किसी नागरिक को गिरफ्तार किया जाता है तो वह न्याय के लिए हैबियस कॉर्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण पर ही भरोसा कर सकते हैं। इसे नकारा जाना वैसा ही है जैसे पुलिस अपराधों को दर्ज न करके उनकी तादाद कम करती है।

यह तय कर पाना मुश्किल है कि हाल के दशकों मेंं पुलिस और न्यायपालिका में से किस संस्थान का अधिक पराभव हुआ है। परंतु आज जो हालात हैं उनमेंं आप आसानी से पा सकते हैं कि पुलिस अधिकारी बिना किसी ठोस सबूत के लोगों पर आईपीसी की गंभीर धाराओं में मुकदमे कायम कर देते हैं।

आप यह सोच सकते हैं कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है जो आसानी से यह देख सकता है कि पुलिस के पास कोई खास प्रमाण नहीं है। एक बार जब मजिस्ट्रेट इसे देख लेता है तो उसका आदेश स्वर्गीय न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर की उस अमर उक्ति से संचालित होता है: जमानत नियम है, न कि जेल। परंतु हमारी धारणा के उलट कृष्ण अय्यर की उक्ति अमर नहीं थी। इस उक्ति की बार-बार हत्या की जा रही है। हालिया दिनों में कम से कम तीन बार ऐसा हुआ। मुनव्वर फारुखी के अलावा नौदीप कौर और दिशा रवि के मामले इसकी बानगी हैं।

एक पर आरोप था वह आपत्तिजनक चुटकुले ‘सुनाने जा रहा था।’ उसे केवल अपराध करने का इरादा रखने के कारण जेल भेज दिया गया। यानी बिना अपराध घटित हुए। दूसरा मामला नौदीप का है जिन पर हत्या के आरोप का इल्जाम लगाते हुए आईपीसी की धारा 307 लगाई गई है। तीसरा मामला और बुरा यानी देशद्रोह का है।

हर मामले में प्रथम मजिस्ट्रेट ने जिसके पास नागरिक न्याय और संरक्षण की आशा में जाते हैं, ने ऐसे व्यवहार किया जैसे मूल नियम जेल भेजने का हो और जमानत देना उनकी हैसियत के बाहर की बात हो।

नौदीप कौर को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने जमानत दी क्योंकि उसे धारा 307 लगाने का कोई प्रमाण नहीं मिला। कौर पहले जिन अदालतों में गई थीं उन्हें ऐसा नहीं लगा था। उन्हें अकारण 45 दिन जेल में बिताने पड़े। जाहिर है उच्च न्यायालय भी उन न्यायाधीशों को जवाबदेह नहीं ठहराएगा।

फारुखी को जमानत देने से तीन बार इनकार किया गया। यहां तक कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी उन्हें उपदेश देकर वापस जेल भेज दिया। उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिली लेकिन तब तक वह 36 दिन जेल में बिता चुके थे। आपकी आजादी का छिनना या एक दिन की जेल भी आपको गहरे तक प्रभावित करती है। फारुखी के साथ गिरफ्तार किए गए प्रखर व्यास और एडविन एंथनी को भी फारुखी के समान न्याय देने के लिए अंतरिम जमानत दी गई लेकिन दो अन्य नलिन यादव और सदाकत को जमानत देने से कई बार इनकार किया गया। बहरहाल कई बार नकारे जाने के बाद आखिरकार उच्च न्यायालय ने इन दोनों को भी जमानत दे दी।

दिशा रवि को दिल्ली पुलिस ने बेंगलूरु में एक शनिवार को गिरफ्तार किया। उन्हें उड़ान से तत्काल दिल्ली लाया गया और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया जिसने उन्हें पहले पांच दिन और फिर दो दिन की पुलिस हिरासत दी। मजिस्ट्रेट को उनके खिलाफ देशद्रोह के प्रमाण अधूरे और नाकाफी नहीं लगे जैसा कि बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पाया। न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने जमानत आदेश में जो प्रेरक पंक्तियां लिखीं हमने उनको सराहा और ऐसा करना भी चाहिए। परंतु सच यह है कि एक नागरिक को 10 दिन तक आजादी से वंचित रखा गया। सात दिन पुलिस हिरासत में और तीन दिन तिहाड़ में।

आप उनकी राजनीति के बारे में कुछ भी सोचें लेकिन वह एक भारतीय नागरिक हैं जिसे कानून और संविधान का वही संरक्षण हासिल है जो हम सबको प्राप्त है। दिल्ली पुलिस कहती है कि उसने गिरफ्तारी में सारी प्रक्रियाओं का पालन किया और वह सही है। उसने स्थानीय पुलिस की मदद ली और रवि को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जो विधिसम्मत है।

अब दिशा के नजरिये से हालात को देखें। उन्हें बिना वकील के विमान से ले जाया गया और अदालत में पेश किया गया जहां वह अपनी पसंद का वकील तक नहीं कर सकीं। इसके बाद उन्हें लॉकअप में डाल दिया गया। मानो वह कोई दाउद इब्राहिम हों। अब सोचिए अगर उक्त मजिस्ट्रेट ने भी वही निर्णय दिया होता जो न्यायाधीश राणा ने 10 दिन बाद दिया तो क्या होता? दूसरे शहर से लाई गई दिशा इतनी जल्दी जमानत का इंतजाम कैसे करतीं? उसी दिन बेंगलूरु वापसी की व्यवस्था कैसे करतीं? यह सवाल दिल्ली पुलिस या मजिस्ट्रेट से कोई नहीं पूछेगा।

जिस सप्ताह उपरोक्त तीनों को जमानत मिली, उसी सप्ताह इलाहाबाद उच्च न्यायालय से खबर आई कि एमेजॉन प्राइम वीडियो की विषयवस्तु और सामग्री प्रमुख (भारत) और सैफ अली खान अभिनीत वेबसीरीज तांडव की निर्माण टीम की प्रमुख अपर्णा पुरोहित पर हिंदू देवताओं का अपमान करने के लिए कई प्राथमिकी दर्ज की गईं। उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने एक स्तब्ध करने वाली टिप्पणी में कहा कि उनके कृत्य देश के बहुसंख्यक नागरिकों के मूलभूत अधिकारों के खिलाफ हैं और अग्रिम जमानत देकर अदालत उनके जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार का बचाव नहीं कर सकती। यह सब हमें एक लोकतांत्रिक, संवैधानिक गणराज्य में सिखाया जा रहा है जहां बुनियादी सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति के अधिकार सबसे ऊपर हैं। लोकतंत्र में संख्या बल से ताकत मिलती है। यदि न्याय भी संख्या बल से चलने लगा तो हम भीड़ तंत्र में बदल जाएंगे।

संभव है कि अपर्णा पुरोहित को सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिल जाए। क्योंकि सन 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने अर्णेश कुमार के मामले में उन मामलों में गिरफ्तारी को लेकर कड़े मानक तय किए थे जिनमें सात वर्ष से कम की सजा है।

अर्णेश कुमार पर आईपीसी की धारा 498-ए (दहेज प्रताडऩा) का आरोप था और उन्हें गिरफ्तारी की आशंका थी। अग्रिम जमानत से इनकार किए जाने पर वह सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे। वहां से उन्हें राहत मिली और न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति पर ऐसा आरोप है जिसमें सात वर्ष से कम की सजा है तो गिरफ्तारी के लिए पुलिस को इस बात से संतुष्ट होना होगा कि एक और अपराध होने वाला है, सबूत नष्ट हो सकते हैं या गवाह को धमकाया जा सकता है।

गिरफ्तारी के लिए एक सूची बनानी होगी जिसमें उसकी वजह का स्पष्ट उल्लेख करते हुए मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा। मैंने जिन मामलों का जिक्र किया उनमें मुनव्वर के मामले में इसका स्पष्ट उल्लंघन किया गया। इसे मखौल माना जाएगा क्योंकि हर व्यक्ति के पास ऊपरी अदालत में जाने की क्षमता नहीं होती। यदि हो भी तो उन्हें पहले कई सप्ताह का समय जेल में बिताना होता। यदि अदालत अर्णेश कुमार मामले की नजीर दे तो भी पुलिस और राजनीति का गठजोड़ शायद ही इसे तवज्जो दे। यदि वे किसी को जेल भेजना चाहते हैं तो उनका पसंदीदा हथियार है देशद्रोह जिसके लिए आजीवन कारावास की सजा तय है।


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